Category Archives: freedom

When we don’t accept ourselves then we get oversensitive to rejection.

When we don’t accept our-self then we lose faith in ourselves and feel weakness in our conscious and subconscious mind.

Instead of defeating others it is necessary to accept oneself in order to keep oneself superior and one step ahead.

Remember that when you do not accept yourself, then this world also will not accept you. If you want to mold your life in the copy of others, then you will destroy your existence but at the same time, you are losing faith in the power of God which has made you very special.

When you do not accept yourself, you will start giving more recognition to material things and will feel lonely because things cannot take the place of feelings. When you cannot accept yourself you will not be able to find Jagaz to hide yourself. Truth will start seeing you enemies. Even in the waking state, nightmares will not let you sleep.

In the stage of accepting yourself, you will be able to find yourself and recognize the real goal of your life. This world is not so generous that they will come to solve all your problems and help you in achieving your goals. In fact, when you are not trusting yourself, then how will the other trust you.

Tej

अभिव्यक्ति, अधिकार, पत्रकारिता और सरकार का अत्याचार

वाल्तेयर ने कहा था कि “हो सकता है मैं आपके विचारों से सहमत ना हो पाऊं फिर भी विचार प्रकट करने की आप के अधिकारों की रक्षा करूंगा।”


भारतीय संविधान में स्वतंत्रता का अधिकार मूल अधिकारों में सम्मिलित है। इसकी 19, 20, 21 तथा 22 क्रमांक की धाराएँ नागरिकों को बोलने एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सहित 6 प्रकार की स्वतंत्रता प्रदान करतीं हैं।
भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भारतीय संविधान में धारा 19 द्वारा सम्मिलित छह स्वतंत्रता के अधिकारों में से एक है।
अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत पत्रकारों को बोलने व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए मिले अधिकार का वर्तमान संदर्भों में देखने पर प्रतीत होता है कि इसका गला घोंटकर संविधान की मूल आत्मा को प्रताड़ित किया जा रहा है।


एक पत्रकार भी इसी देश का नागरिक हैं। देश, काल और परिस्थितियों के साथ एक पत्रकार के विचार भी प्रभावित होते है और उसका प्रतिरूप उसके अभिव्यक्ति के साथ प्रदर्शित भी होता है। सरकार अगर मीडिया को एक दृष्टिकोण अपनाने के लिए बाध्य करती है तो नागरिकों की स्वतंत्रता का अस्तित्व ही नहीं बचेगा।
लोकतंत्र में क्षेत्र, भाषा, जाति, धर्म और सम्प्रदाय की विलक्षण अनेकता में विचारों का सम्मिश्रण और उसके आधार पर विचारों का प्रस्फुटन बिना किसी भय के अभिव्यक्त करने का अधिकार इस संविधान की मूल आत्मा है बशर्ते कि वह राष्ट की एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाने वाली न हो।
पत्रकारिता को नियम और संयम का पाठ सिखाने की कोशिश राजनीति की वह धारा कर रही है जिसका स्वयं का इतिहास रसातल में डूबा हुआ और घोर कलंकित है।
व्यक्ति से विचार बनता है या विचार से व्यक्ति बनता है, यह दोनों अपने अपने संधर्भ में ठीक है किंतु सत्ता के विरोध में खड़ा हुआ व्यक्ति या व्यक्ति के विचार के विस्तार का दमन उस विकृत मानसिकता को परिलक्षित करता है जहाँ सत्ता के विरोध का कोई अस्तित्व स्वीकार्य न हो।


लोकतंत्र में जीवित और जीवंत व्यक्ति अपने अस्तित्व के होने का अहसास अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से ही महसूस कर सकता हैं अन्यथा 1920 और 2020 में कोई अंतर हो ही नही सकता।
कुछ तरह की पत्रकारिता के बारे में मैं स्वयं भी विरोध में हूँ किंतु अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सदैव कायम रहनी चाहिए।
व्यक्ति अथवा सरकार के खिलाफ अभिव्यक्ति की बात तो अलग है किंतु इस देश में कुछ लोगो ने तो राष्ट विरोधी अभियान और अभिव्यक्ति को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सही ठहराने का प्रयास किया है।


यह अक्सर देखा गया है कि राष्ट्र विरोधी मानसिकता वाले लोगों की राष्ट्रद्रोही अभिव्यक्ति पर प्रश्नचिन्ह लगाने पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता विशेष तौर पर खतरे में आ जाती है किंतु राष्ट्रवाद की बात करने वाले लोगो की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान उन्ही लोगो को बर्दाश्त नहीं होता। यह भ्रष्ट और दोगले लोगो की मानसिकता है।


एक धर्म जब जातियों के नाम पर, भाषा के नाम पर, क्षेत्र के नाम पर, सम्प्रदाय के नाम पर खंडित होता है तब राष्टद्रोही नरपिशाच उस विखंडन का पूर्ण लाभ प्राप्त करता है।
राष्ट्र पर और अपने अस्तित्व पर भी जब कुठाराघात होता है तब भी अगर जाति, भाषा, क्षेत्र और सम्प्रदाय को ही प्रथम मानकर व्यक्ति मौन व्रत धारण कर लेता है तब पतन ही होगा।
मुखर होना या मौन धारण करने का विकल्प चुनना निस्संदेह सबका अपना वैयक्तिक विचार और अधिकार है लेकिन आपकी संस्कृति के अस्तित्व को मिटाने वाली आग जब आपके घर तक पहुँचेगी तब तक आपकी पूरी बस्ति में सब कुछ नष्ट हो चुका होगा और नरपिशाचों और भेड़ियों की उस भीड़ का सामना करने के लिए आप भी तब अपने को अकेला ही पाएंगे। अपनी जाति, भाषा, क्षेत्र और संप्रदाय का झण्डा उठा कर कब तक सांसे गिन पाएंगे?


आपका ये बिखराव ही आपकी कमजोरी है और इसी बिखराव का लुत्फ कुछ लोग ले रहे है और आप ऐसा होने दे रहे है।
यही वजह है कि आज एक पत्रकार की गिरफ्तारी पर एक पड़ोसी दुश्मन राष्ट आनंदित है और हमारे देश के कुछ लोग भी आनंदित हो रहे है जो कि रहते इस देश मे है लेकिन उसकी आत्मा दुश्मन देश की भक्त है।
आश्चर्य होता है कि कोई देश और उस देश का बहुतायत जनमानस स्वतंत्रता के मात्र 73 वर्षों के पूर्व का विध्वंसक इतिहास कैसे भूल सकता है? 500 वर्षो की गुलामी के मूल कारणों को इतना शीघ्र कैसे विस्मृत किया जा सकता है?
अपनी व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जीवंत रखने के लिए मेने यह लिखा है और हमेशा सत्य के लिए लिखता रहूँगा।

✍️तेज