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अभिव्यक्ति, अधिकार, पत्रकारिता और सरकार का अत्याचार

वाल्तेयर ने कहा था कि “हो सकता है मैं आपके विचारों से सहमत ना हो पाऊं फिर भी विचार प्रकट करने की आप के अधिकारों की रक्षा करूंगा।”


भारतीय संविधान में स्वतंत्रता का अधिकार मूल अधिकारों में सम्मिलित है। इसकी 19, 20, 21 तथा 22 क्रमांक की धाराएँ नागरिकों को बोलने एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सहित 6 प्रकार की स्वतंत्रता प्रदान करतीं हैं।
भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भारतीय संविधान में धारा 19 द्वारा सम्मिलित छह स्वतंत्रता के अधिकारों में से एक है।
अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत पत्रकारों को बोलने व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए मिले अधिकार का वर्तमान संदर्भों में देखने पर प्रतीत होता है कि इसका गला घोंटकर संविधान की मूल आत्मा को प्रताड़ित किया जा रहा है।


एक पत्रकार भी इसी देश का नागरिक हैं। देश, काल और परिस्थितियों के साथ एक पत्रकार के विचार भी प्रभावित होते है और उसका प्रतिरूप उसके अभिव्यक्ति के साथ प्रदर्शित भी होता है। सरकार अगर मीडिया को एक दृष्टिकोण अपनाने के लिए बाध्य करती है तो नागरिकों की स्वतंत्रता का अस्तित्व ही नहीं बचेगा।
लोकतंत्र में क्षेत्र, भाषा, जाति, धर्म और सम्प्रदाय की विलक्षण अनेकता में विचारों का सम्मिश्रण और उसके आधार पर विचारों का प्रस्फुटन बिना किसी भय के अभिव्यक्त करने का अधिकार इस संविधान की मूल आत्मा है बशर्ते कि वह राष्ट की एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाने वाली न हो।
पत्रकारिता को नियम और संयम का पाठ सिखाने की कोशिश राजनीति की वह धारा कर रही है जिसका स्वयं का इतिहास रसातल में डूबा हुआ और घोर कलंकित है।
व्यक्ति से विचार बनता है या विचार से व्यक्ति बनता है, यह दोनों अपने अपने संधर्भ में ठीक है किंतु सत्ता के विरोध में खड़ा हुआ व्यक्ति या व्यक्ति के विचार के विस्तार का दमन उस विकृत मानसिकता को परिलक्षित करता है जहाँ सत्ता के विरोध का कोई अस्तित्व स्वीकार्य न हो।


लोकतंत्र में जीवित और जीवंत व्यक्ति अपने अस्तित्व के होने का अहसास अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से ही महसूस कर सकता हैं अन्यथा 1920 और 2020 में कोई अंतर हो ही नही सकता।
कुछ तरह की पत्रकारिता के बारे में मैं स्वयं भी विरोध में हूँ किंतु अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सदैव कायम रहनी चाहिए।
व्यक्ति अथवा सरकार के खिलाफ अभिव्यक्ति की बात तो अलग है किंतु इस देश में कुछ लोगो ने तो राष्ट विरोधी अभियान और अभिव्यक्ति को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सही ठहराने का प्रयास किया है।


यह अक्सर देखा गया है कि राष्ट्र विरोधी मानसिकता वाले लोगों की राष्ट्रद्रोही अभिव्यक्ति पर प्रश्नचिन्ह लगाने पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता विशेष तौर पर खतरे में आ जाती है किंतु राष्ट्रवाद की बात करने वाले लोगो की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान उन्ही लोगो को बर्दाश्त नहीं होता। यह भ्रष्ट और दोगले लोगो की मानसिकता है।


एक धर्म जब जातियों के नाम पर, भाषा के नाम पर, क्षेत्र के नाम पर, सम्प्रदाय के नाम पर खंडित होता है तब राष्टद्रोही नरपिशाच उस विखंडन का पूर्ण लाभ प्राप्त करता है।
राष्ट्र पर और अपने अस्तित्व पर भी जब कुठाराघात होता है तब भी अगर जाति, भाषा, क्षेत्र और सम्प्रदाय को ही प्रथम मानकर व्यक्ति मौन व्रत धारण कर लेता है तब पतन ही होगा।
मुखर होना या मौन धारण करने का विकल्प चुनना निस्संदेह सबका अपना वैयक्तिक विचार और अधिकार है लेकिन आपकी संस्कृति के अस्तित्व को मिटाने वाली आग जब आपके घर तक पहुँचेगी तब तक आपकी पूरी बस्ति में सब कुछ नष्ट हो चुका होगा और नरपिशाचों और भेड़ियों की उस भीड़ का सामना करने के लिए आप भी तब अपने को अकेला ही पाएंगे। अपनी जाति, भाषा, क्षेत्र और संप्रदाय का झण्डा उठा कर कब तक सांसे गिन पाएंगे?


आपका ये बिखराव ही आपकी कमजोरी है और इसी बिखराव का लुत्फ कुछ लोग ले रहे है और आप ऐसा होने दे रहे है।
यही वजह है कि आज एक पत्रकार की गिरफ्तारी पर एक पड़ोसी दुश्मन राष्ट आनंदित है और हमारे देश के कुछ लोग भी आनंदित हो रहे है जो कि रहते इस देश मे है लेकिन उसकी आत्मा दुश्मन देश की भक्त है।
आश्चर्य होता है कि कोई देश और उस देश का बहुतायत जनमानस स्वतंत्रता के मात्र 73 वर्षों के पूर्व का विध्वंसक इतिहास कैसे भूल सकता है? 500 वर्षो की गुलामी के मूल कारणों को इतना शीघ्र कैसे विस्मृत किया जा सकता है?
अपनी व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जीवंत रखने के लिए मेने यह लिखा है और हमेशा सत्य के लिए लिखता रहूँगा।

✍️तेज

Importance of Food.

The exchange of power in life goes on continuously as a sequence. One to the second and the third to the rest are formed. We can see this sequence of creation in our own body. There is a saying- ‘Just like food, like how mind. ‘Our body is made by the food we eat. It is also considered by modern medicine. Indian knowledge is above this.

Emotion is also important along with food; Because it satisfies the eater’s mind. The food is made with which emotion, with which emotion and affection, with which environment and emotion food is taken, etc. things have a direct effect on the mind.

A person performs actions to fulfill the desires of the mind. Desire cannot be born of the will of the person. To fulfill or not to do is the will of the person. When desire arises from some other power and it drives our life, then we automatically become instruments. Our system of intelligence decides, plans and directs the body accordingly. He gets involved in body work.

This means that mind is king, intellect and body are servants. Therefore, empowering the mind, which is our identity, is our first religion, so that our identity also remains the same. Its simplest and main route is food. Food is the first expression of every joy in Indian culture. From birth, marriage etc. to life, why not have any other expectation ahead of food, feast, party? Because life-force is associated with it. This makes the mind flourish. The environment also contributes to this.

Food reaches the body and makes juice. Blood, flesh, fennel, marrow, bone and semen are made from juice. The one who survives gets out as feces and urine. Here the bulk construction work ends.

The semen is further converted into energy, this is what makes a person’s mind. This is the ‘ooze’ of the face. This becomes the identity of personality. The importance of Brahmacharya should also be understood in this context. The qualities of food – Sattva, Raja, Tama become important parts of our personality. Therefore, food is important from every point of view.

✍️Tej

Caste and Religion | जाति एवं धर्म

✍️जातीय व्यवस्था अप्रासंगिक है लेकिन धर्म की व्यवस्था कभी भी अप्रांसगिक नही हो सकती एवं होनी भी नही चाहिए। जातीय अव्यवस्था ने सनातन धर्म एवं संस्कृति को कमजोर किया है। वर्ण व्यवस्था कर्म के यथार्थ स्वरूप को परिलक्षित करती थी जिसने समय उपरांत जातीय व्यवस्था का विकृत स्वरूप ले लिया। और इसी अव्यवस्था ने सनातन धर्म को कमजोर कर दिया।
समग्र इतिहास के संक्षिप्त अवलोकन के आधार पर यह स्वीकार्यता बढ़ती है कि सनातन धर्म का क्षरण जातीय अव्यवस्था की देन है अन्यथा आर्थिक और सामरिक रूप से सिरमौर यह राष्ट्र सदियो तक क्यो गुलामी का दंश झेलता रहा।

फिर भी इतिहास और वर्तमान के तमाम मतभेदों को क्षीण करते हुए सनातन धर्म में आस्था रखने वाले व्यक्ति को सनातन धर्म को पुष्ट करने एवं एकीकृत होने का प्रयास किया जाना चाहिए।

अपनी धार्मिक सभ्यता और सांस्कृतिक आत्मा को जीवित रखने और उसे समृद्ध करने का अर्थ किसी अन्य धार्मिक विचार को क्षरण करना नही है किंतु आज की राजनीतिक विडंबना है कि कुछ छ्द्म धर्मनिरपेक्ष वादी राजनीतिक दल और पत्रकार आपको कुंठित मानसिकता का शिकार और साम्प्रदायिक ठहरा देते है।

यह ठीक वैसे ही है जैसे कि मैं निःसंदेह प्रत्येक व्यक्ति के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूँ लेकिन अपने स्वयं के अच्छे स्वास्थ्य की कामना नही कर सकता!!!
धर्म अस्तित्व की आत्मा है और अगर आत्मा ही न रहे तो अस्तित्व कहाँ बचेगा।

अगर इस देश में छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर किसी एक संस्कृति का क्षरण हुआ है तो वो सिर्फ सनातन संस्कृति है। कुछ राजनीतिक और कथित बुद्धिजीवी वर्ग की अपनी महत्वकांक्षी आकांक्षाओं के चलते सनातन धर्म को आतंक के कटघरे तक मे खड़ा किया गया।
समस्त संसार में सनातन धर्म से श्रेष्ठ सहअस्तित्व का विचारदर्शन और परम्परा कही नही मिलती फिर भी गाली सनातन को ही दी जाती है। क्यो?
मैं इस क्यो के साथ अपनी कलम को यही विराम देता हूँ।
इस क्यो? का उत्तर मेरे लेख की प्रस्तावना से ही शुरू होता है।

✍️Tej

Caste and Religion | जाति एवं धर्म

✍️जातीय व्यवस्था अप्रासंगिक है लेकिन धर्म की व्यवस्था कभी भी अप्रांसगिक नही हो सकती एवं होनी भी नही चाहिए। जातीय अव्यवस्था ने सनातन धर्म एवं संस्कृति को कमजोर किया है। वर्ण व्यवस्था कर्म के यथार्थ स्वरूप को परिलक्षित करती थी जिसने समय उपरांत जातीय व्यवस्था का विकृत स्वरूप ले लिया। और इसी अव्यवस्था ने सनातन धर्म को कमजोर कर दिया।
समग्र इतिहास के संक्षिप्त अवलोकन के आधार पर यह स्वीकार्यता बढ़ती है कि सनातन धर्म का क्षरण जातीय अव्यवस्था की देन है अन्यथा आर्थिक और सामरिक रूप से सिरमौर यह राष्ट्र सदियो तक क्यो गुलामी का दंश झेलता रहा।

फिर भी इतिहास और वर्तमान के तमाम मतभेदों को क्षीण करते हुए सनातन धर्म में आस्था रखने वाले व्यक्ति को सनातन धर्म को पुष्ट करने एवं एकीकृत होने का प्रयास किया जाना चाहिए।

अपनी धार्मिक सभ्यता और सांस्कृतिक आत्मा को जीवित रखने और उसे समृद्ध करने का अर्थ किसी अन्य धार्मिक विचार को क्षरण करना नही है किंतु आज की राजनीतिक विडंबना है कि कुछ छ्द्म धर्मनिरपेक्ष वादी राजनीतिक दल और पत्रकार आपको कुंठित मानसिकता का शिकार और साम्प्रदायिक ठहरा देते है।

यह ठीक वैसे ही है जैसे कि मैं निःसंदेह प्रत्येक व्यक्ति के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूँ लेकिन अपने स्वयं के अच्छे स्वास्थ्य की कामना नही कर सकता!!!
धर्म अस्तित्व की आत्मा है और अगर आत्मा ही न रहे तो अस्तित्व कहाँ बचेगा।

अगर इस देश में छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर किसी एक संस्कृति का क्षरण हुआ है तो वो सिर्फ सनातन संस्कृति है। कुछ राजनीतिक और कथित बुद्धिजीवी वर्ग की अपनी महत्वकांक्षी आकांक्षाओं के चलते सनातन धर्म को आतंक के कटघरे तक मे खड़ा किया गया।
समस्त संसार में सनातन धर्म से श्रेष्ठ सहअस्तित्व का विचारदर्शन और परम्परा कही नही मिलती फिर भी गाली सनातन को ही दी जाती है। क्यो?
मैं इस क्यो के साथ अपनी कलम को यही विराम देता हूँ।
इस क्यो? का उत्तर मेरे लेख की प्रस्तावना से ही शुरू होता है।

✍️Tej

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