हमारा अस्तित्व, हमारी पहचान और हमारा सम्मान कभी भी हमारे शरीर, जाति या हमारे कपड़ों से नहीं होता बल्कि हमारी पहचान और हमारा सम्मान हमारे कार्य, शब्दों के प्रति समर्पण और लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता के कारण होता है। हम जीवन में जो भी पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, व्यावसायिक लक्ष्य निर्धारित करते है खासकर तब जबकी किसी संगठन से जुड़े होने पर, अगर उस लक्ष्य को पूर्ण समर्पण और प्रतिबद्धता के साथ करने में विफल होते है तो समयपरांत संगठन में हमारी विश्वनीयता पर संदेह पैदा होने लगता है क्योंकि लक्ष्य तक पहुंचने में सदैव निष्फल वह व्यक्ति सिर्फ बहाने ढूंढता है और उस जैसे व्यक्तियों के कारण अन्य प्रभुद्ध व्यक्तियों की जवाबदेही भी विफलता के घेरे में आती है।
अगर आप भीड़ का हिस्सा नही बनना चाहते हैं तो अपने शब्दों और लक्ष्य के प्रति समर्पित होकर उसे सामान्य या असामान्य हर परिस्थिति में प्राप्त करने का जुनून पैदा कीजिये। कहानियां सिर्फ किताबो में अच्छी लगती हैं, वास्तविक जीवन यथार्थ के धरातल पर टिका होता है।

Caste and Religion | जाति एवं धर्म

✍️जातीय व्यवस्था अप्रासंगिक है लेकिन धर्म की व्यवस्था कभी भी अप्रांसगिक नही हो सकती एवं होनी भी नही चाहिए। जातीय अव्यवस्था ने सनातन धर्म एवं संस्कृति को कमजोर किया है। वर्ण व्यवस्था कर्म के यथार्थ स्वरूप को परिलक्षित करती थी जिसने समय उपरांत जातीय व्यवस्था का विकृत स्वरूप ले लिया। और इसी अव्यवस्था ने सनातन धर्म को कमजोर कर दिया।
समग्र इतिहास के संक्षिप्त अवलोकन के आधार पर यह स्वीकार्यता बढ़ती है कि सनातन धर्म का क्षरण जातीय अव्यवस्था की देन है अन्यथा आर्थिक और सामरिक रूप से सिरमौर यह राष्ट्र सदियो तक क्यो गुलामी का दंश झेलता रहा।

फिर भी इतिहास और वर्तमान के तमाम मतभेदों को क्षीण करते हुए सनातन धर्म में आस्था रखने वाले व्यक्ति को सनातन धर्म को पुष्ट करने एवं एकीकृत होने का प्रयास किया जाना चाहिए।

अपनी धार्मिक सभ्यता और सांस्कृतिक आत्मा को जीवित रखने और उसे समृद्ध करने का अर्थ किसी अन्य धार्मिक विचार को क्षरण करना नही है किंतु आज की राजनीतिक विडंबना है कि कुछ छ्द्म धर्मनिरपेक्ष वादी राजनीतिक दल और पत्रकार आपको कुंठित मानसिकता का शिकार और साम्प्रदायिक ठहरा देते है।

यह ठीक वैसे ही है जैसे कि मैं निःसंदेह प्रत्येक व्यक्ति के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूँ लेकिन अपने स्वयं के अच्छे स्वास्थ्य की कामना नही कर सकता!!!
धर्म अस्तित्व की आत्मा है और अगर आत्मा ही न रहे तो अस्तित्व कहाँ बचेगा।

अगर इस देश में छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर किसी एक संस्कृति का क्षरण हुआ है तो वो सिर्फ सनातन संस्कृति है। कुछ राजनीतिक और कथित बुद्धिजीवी वर्ग की अपनी महत्वकांक्षी आकांक्षाओं के चलते सनातन धर्म को आतंक के कटघरे तक मे खड़ा किया गया।
समस्त संसार में सनातन धर्म से श्रेष्ठ सहअस्तित्व का विचारदर्शन और परम्परा कही नही मिलती फिर भी गाली सनातन को ही दी जाती है। क्यो?
मैं इस क्यो के साथ अपनी कलम को यही विराम देता हूँ।
इस क्यो? का उत्तर मेरे लेख की प्रस्तावना से ही शुरू होता है।

✍️Tej

Caste and Religion | जाति एवं धर्म

✍️जातीय व्यवस्था अप्रासंगिक है लेकिन धर्म की व्यवस्था कभी भी अप्रांसगिक नही हो सकती एवं होनी भी नही चाहिए। जातीय अव्यवस्था ने सनातन धर्म एवं संस्कृति को कमजोर किया है। वर्ण व्यवस्था कर्म के यथार्थ स्वरूप को परिलक्षित करती थी जिसने समय उपरांत जातीय व्यवस्था का विकृत स्वरूप ले लिया। और इसी अव्यवस्था ने सनातन धर्म को कमजोर कर दिया।
समग्र इतिहास के संक्षिप्त अवलोकन के आधार पर यह स्वीकार्यता बढ़ती है कि सनातन धर्म का क्षरण जातीय अव्यवस्था की देन है अन्यथा आर्थिक और सामरिक रूप से सिरमौर यह राष्ट्र सदियो तक क्यो गुलामी का दंश झेलता रहा।

फिर भी इतिहास और वर्तमान के तमाम मतभेदों को क्षीण करते हुए सनातन धर्म में आस्था रखने वाले व्यक्ति को सनातन धर्म को पुष्ट करने एवं एकीकृत होने का प्रयास किया जाना चाहिए।

अपनी धार्मिक सभ्यता और सांस्कृतिक आत्मा को जीवित रखने और उसे समृद्ध करने का अर्थ किसी अन्य धार्मिक विचार को क्षरण करना नही है किंतु आज की राजनीतिक विडंबना है कि कुछ छ्द्म धर्मनिरपेक्ष वादी राजनीतिक दल और पत्रकार आपको कुंठित मानसिकता का शिकार और साम्प्रदायिक ठहरा देते है।

यह ठीक वैसे ही है जैसे कि मैं निःसंदेह प्रत्येक व्यक्ति के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूँ लेकिन अपने स्वयं के अच्छे स्वास्थ्य की कामना नही कर सकता!!!
धर्म अस्तित्व की आत्मा है और अगर आत्मा ही न रहे तो अस्तित्व कहाँ बचेगा।

अगर इस देश में छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर किसी एक संस्कृति का क्षरण हुआ है तो वो सिर्फ सनातन संस्कृति है। कुछ राजनीतिक और कथित बुद्धिजीवी वर्ग की अपनी महत्वकांक्षी आकांक्षाओं के चलते सनातन धर्म को आतंक के कटघरे तक मे खड़ा किया गया।
समस्त संसार में सनातन धर्म से श्रेष्ठ सहअस्तित्व का विचारदर्शन और परम्परा कही नही मिलती फिर भी गाली सनातन को ही दी जाती है। क्यो?
मैं इस क्यो के साथ अपनी कलम को यही विराम देता हूँ।
इस क्यो? का उत्तर मेरे लेख की प्रस्तावना से ही शुरू होता है।

✍️Tej

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There is always a choice in life and that’s decide our today and tomorrow. It depends on what we choose either to choose ease one or best one. Giving up is an easiest way to run away from challanges but it can’t lead to something great.

There is always saying that making efforts is always win win situation because either you win or you learn from failure which will help you in advance times.

95% people in this world give up after some hard barrier while rest of 5% people break that hard barrier and creates history. Psychological research reveals that hard barriers or difficult situations is basically connected with mental toughness and relates to comfort zone also.

So don’t fear with failures because failure is a first step for success. Don’t stop until you get what you wanted. There is no place of regrets and crying in this world because world will test your affirmation first then only will follow you.

So get up my friends and don’t give up until you get your goals.

Go4great.wordpress.com is a platform that will always help you to find meaning of your life, achieve your goals.

✍️Tejhpal Singh